Thursday, June 9, 2011

शब्दों की व्यंजना

कभी एक बार कही पढ़ था ----
शब्दों की व्यंजनाओ के बीच
अच्छे के साथ तो
सभी अच्छा करते है
तुम बुरो की साथ भी अच्छे रहो----
आंसू को पानी से धोया जा सकता है
पर -----खून को खून से
धोया
नहीं जा सकता  ----
---प्रणाम ---

Monday, June 6, 2011

शिष्टाचार



शिष्टाचार ---
वो भी संस्कार गत
मन बोला ----
जीवन का शिष्ट होना
न केवल काफी है ----
शिष्ट आचरण ही --
शिष्टाचार  का पर्यावाची है ------
शिष्टाचार -----
नेतिक -सामाजिक
जागरूकता का
बोधक है --------
अवनति से उन्नति तक का
खोजी है -------
चेतना जब ---
रिक्त हो जाती है ---
संस्कारगत शिष्टाचार  ही
काम आती है ------
दोस्तों ---संस्कारगत
शिष्टाचार  की बात करे तो
हमारी शिष्टाचार
सभ्य -उदारवादी है
शालीनता से किया गया काम
संस्कारगत  शिष्टाचार  है ----
मेरे बुजुर्गो ने
एसा ही बोला है ----
शिष्टाचार  की व्याख्या मुश्किल है
पर अंत नहीं -----
यूगो तक चलने के बाद
ये समझा है ----
माधुर्यता - सादगी -ओ -
सज्जनता इसकी बानगी है ---
बाकी सब एक कहानी है ---
सामान्य से  लगने वाले
ये "नाद" नहीं  ---
सागर है -----
एक सेतु बना सकते है ---
हम सभी को
सभ्य -ओ- शिष्ट
बना सकते है ----
दूसरो के प्रति
प्रेमात्मक रवैया
सहयोगी नजरिया
स्वार्थ रहित जीवन को दर्शाते  है
चिंतन को जब
आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है
कोई सिद्धांत बोया जाता है
पाता हु
शिष्टाचार  वो भी संस्कारगत
जीवन को सादगी पूर्ण
बनाता है ----
शायद हमें
विश्वासी - भाव - वेदनाओं
से आत्म सात कराता है
ये भाव सागर को गागर में
भरने जेसा है
इसी लिए मित्रो
मेरा ये कहना है ---
व्याख्या तो बहुत सुनी पर ---
शिष्टाचार  वो भी संस्कारगत
हमारा अनमोल  गहना है ---
हमारा अनमोल गहना है ------

Sunday, June 5, 2011

फितरत


रेंग कर चलना ही
अब फितरत है
आइना देखना
ही अब हसरत है
तुम से क्या कहू
अब --हमदम
नजर भर
देखना भी
मशकत है ---..


Friday, June 3, 2011

बचपन


बचपन की बात करू तो
कविता नहीं बनती ---
जीवन की संध्या में
आग नहीं बसती---
एक कोशिस की बचपन को
जीने की -------
पर अब देखो वो बात
नहीं बनती ---------
खजाने की वो खोज
अब याद नहीं बनती ---
लेकिन ये सच है यारो
चाहत चाँद को पाने की
बचपन को ले आती है ---
पर घर के वो आँगन में वो
रार नहीं मचती -----
नानी की कहानी
वो परियो का फसाना
देखो अब तो  जीवन
में वो बात नहीं होती ------
आज देखा तो पाया ----
बचपन कितना सुहाना होता है
न कोई दुखड़ा न कोई बेगाना होता है
परियो का देश ----और
बहन की गुडिया की सगाई -ओ -शादी
मेरा पंडित बनना सब
जबरन होता है ------
बेवजह रोना ----
फिर चुटकी कटवाना
बहनों का प्रिय खेल होता है --
-केंद्र में बसा मै---
माँ का दुलराना
पिता का कान खीचना
और भाई का मरहम लगाना ---
साइकिल  को चलाना ---
फिर गिर -गिर जाना
बहनों का हंसना
भाइयो का चिढाना
सब कुछ था पर अब
सब सूना -सूना सा है ------.मित्रो ----
बचपन गम से अनजाना
एक सुंदर फसाना होता है
ता उम्र
भागता रहा बड़ा होने के लिए
पर ये ही सच है यारो
प्रिय विजया के द्वारा दिए गये विषय के संदर्भ में ----
बचपन बहुत
सुहाना होता है --------...

Wednesday, June 1, 2011

वसीहत

मेने एक वसीहत की थी
मेरे बाद जब खोली गयी
सब को कुछ मिला पर------
एक तुम जो हम थे
एक डायरी और एक रचना
पाकर भी संतुष्ट ना हुए ---
क्या मेरा मर्म इतना कमजोर
निकला ----
विवेचना जारी है ------------!!.

किनारा

तेरे रुक्सार पर
चिंता की सिलवटे
मेरे भाव कुछ
अनमने -अनमने
कभी तुम बहती हो
कभी हम खोते है
क्या करू ----
किनारा
कोई मिलता ना था -----!

एक आत्म केन्द्रित जवाब -----

एक आत्म केन्द्रित जवाब -----
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देह के पुजारी सब , देख इस को जब
मन को अब धिकारते वो रहते है
प्रभु की आराधना में लीन,
सत्य को भूल अब
जीवन को जीने का तरिका तो
बहुत सा बतियाते वो रहते है ---
साहस कुछ ऐसा देखो ---
सत्य को भी अब वो नकारते से रहते है ---
क्रोध -मोह -काम -सब
त्यागने का उपदेश सब
देखो वो अब यहाँ
केसे -केसे वो नित्य यहाँ देते ही
रहते है ----..