Saturday, June 18, 2011

वतन

जल गया -देश सब
तुम निराहते रहे ---
देश की शान पर
आन और बान पर
मात्र एक वोट को
वतन और जमीन को
तुम सदा ------
रक्त से नहलाते रहे -----
भस्म सब हो गया
अन्धकार बढ़ गया
तुम नई नीति को
और भी चमकाते रहे
और भी -----
चमकाते रहे ------
मन फिर क्यों विद्रोही हो
क्यों ना पूछे तुम से फिर
तुम ही वतन हो
या वतन
तुम से ----एक अनुतरित प्रशन --------
मंथन आप का निर्णय देश का-------
मेरा प्रणाम !!!!

बोंजाई

अक्सर देखा है हमने ----
बड़े शब्द बड़े नहीं होते 
गहराई का होना जरुरी है 
बोंजाई का दौर है दोस्त 
बोने शब्द ही काफी है ---
देखो  जड़ो  को काटो तो ज़रा 
एक विधा है ये ----
नया प्रयोग ---नई सोंच 
हमने चिनार को भी 
घटे रूप में देखा है ------
ये राज वंशो का कोई शौक   नहीं 
दिमाग की खूबी है ----
विराट से लघुता ही 
इन शब्दों की मज़बूरी है ------

Friday, June 17, 2011

कदम


मेरा अक्स अक्सर 
मुझसे ये कहता है ---
अनजान राहो के पीछे 
हम भागते रहे हर दम 
सोंचा रास्ता है 
पार करना होगा 
पर मुझे पता नहीं था-
रास्ता देख कर नहीं 
मंजिल देख कर
 कदम उठाना 
चाहिए ------

साजिशो


ये साजिशो को दौर है 
ज़रा संभालना मेरे दोस्त ---
हाथ में एक 
अददत आइना 
जो है -------

मानवता

जीवन के इन झंझावातो में 
मेने भी कुछ देखा है -----
पुलकित मन और सुंदर तन 
जब वो आया मेरे द्वार ---
हमने भी फिर 
खंडहरो  में ----- 
थिरकन सा कुछ देखा है -----
कोन कहता है की 
मानवता थी जो मर गयी 
हमने तो सुंदर उपवन में 
मयूर नाचते देखा है -----
सच है दुनिया वालो ---मृगतृष्णा
के मध्य वही---उजली धूप
घिरते  बादल 
पानी की  धार और 
रोटी की वो मार ---
फिर भी ---
हमने मानवता को 
उससे लड़ते देखा है -----
एक  प्रशन फिर उठता  है 
आँखों का जंगल बढ़ता है -----?
अंतस की आवाज फिर ये 
उभर -उभर के आती - है -----
ऐसी मानवता में फिर 
रहने का क्या मतलब 
जहां कफ़न की छत पाने 
मानवता फिर लडती है ----
देखो ये भी सच है यारो-
हमने ---मानवता को भी 
 दीवारों  पर 
मरते     देखा है -------??????
मेरे अन्दर का द्वंद जब 
बहुत अधिक टकराता है 
ये सच है यारो ----
मानवता को भी ---घुटते -ओ - 
बहते  फिर देखा है ----------???????
हमने देखा है प्रिये -------मानवता को 
लड़ते हुए--------घायल और लाचार 
मगर फिर भी 
ना जाने क्यों ---?
हमने आज फिर 
ये अंदाज -ए- जहां 
फिर देखा है ------!!!!!!!

Thursday, June 16, 2011

जीवन


जीवन पर लिखने
जब मै जाता हु --
सब शब्द
 मोन हो जाते है ----
अंतस में भी जब
 ज्ञान बंद हो जाते है
ढलती हुई साँसों में
जब प्राण बंद हो जाते है ---
तब मित्रो सच है की
दर्शन याद ये आता है -----
मौत तू ही जीवन है
इसी लिए आता है --------
कहने को वेद सब
सुर्तिया सन्देश सब
यही तक आ के
साथ छोड़ चाले जाते है
चिता की लकड़ी पर तन भी
छुट जाता है ---
ऐसे में मन कही दूर
उड़ जाता है ---
पाता हु अपनों को
अपनों के बीच नहीं
यही एक सत्य
सुन्यता छोड़ जाता है
इसी लिए कहता हु ----
जीवन तो भंगुर है
खाली हाथ आना और
खाली हाथ जाना है
नहीं छोडनी है ---
सुन्यता कोई ऐसी
सुन्यता तो सुन्यता में
विलय हो जाती  है -------

Monday, June 13, 2011

रण

अपनी लड़ाई खुद लड़ो
तुम मोहताज नहीं किसी 
आंधी के ---
उढाओ नफरत के खिलाफ  
इन्कलाब का नया फतवा ---
तुम इतहास हो ---
रचो एक नया वुय्ह 
क्रान्ति तुम में  निहित है 
बंद दरवाजे में 
सुराख से 
आने वाली रौशनी तुम हो 
सार्थक रण के उदगम तुम ---
तुमको मेरा प्रणाम --------!!!!!!