Wednesday, June 22, 2011

अन्वेषण


तुम आशा
 और 
विश्वास की 
बात करते हो 
हम निष्ठा से बंधे है 
तुम आध्यात्मिक हो 
हम  व्यवहारिक है 
इस धरा पर 
क्या मिलना संभव है ----?
आध्यात्मिक कभी 
व्यवहारिक नहीं 
हो सकता -------
और व्यवहार कभी 
आध्यात्मिक नहीं ---
मंथन की सतह पर 
आज फिर निष्ठा और 
आशा और विश्वास 
सामने कुरु छेत्र का 
आभास दे 
रहे है ----------
गीता क्या कहती है ---?
संतुलन के बीच 
आम हो चला "मै"
सत्य का 
अन्वेषण नहीं 
कर पाता -----
हे प्रभु तुमको 
प्रणाम !!!!!!!!!

सहर

एक बदरंगी सी याद है मुझको 
रात  के अँधेरे में जब 
यकीनन --------------
सहर हो जाती है ---
ये सच है दुनिया वालो 
फरिस्तो की भीड़ 
बढ़ जाती है ---
लगता है 
अपनी पलकों पर शोर 
धामे थे अभी -----
चोर दरवाजे से भी 
अब ---
दस्तक हो जाती है कही----?

दरकती है जिन्दगी


कभी सोंचा न था
दिया बुझे गा कभी
रोशनी बंद  हो
चली है आज
खो गयी है अँधेरे मे कही
आस का टिमटिमाता
हुआ सा दिया
खो गया है
गुम  नाम  बस्तियों के बीच
कही ------
केसे जारी रखे कोई अपना- ए-- सफ़र
यारो ----मेरे कदमो तले
दरकती है जिन्दगी -------?..

Tuesday, June 21, 2011

पाषाण


एक दिन  तुमने  कहा था ---
तुम मानव नहीं पाषाण  भले थे 
मै अनुतरित हो गया था
 काल के इस 
प्रशन से ----
ये सच है
 वो  घनी भूत पीड़ा थी 
मेरा पाषाण होना --फिर रोना ---
तुम ना जाने कहाँ से आई 
मुझे सहलाया ----मेरे विवेक को बताया 
पाषाण कहने वालो 
देखो आज मै 
मंदिरों में पूजा जा रहा  हूँ ---
तुमको मेरा प्रणाम !!!!!!!!!

Monday, June 20, 2011

नग्न मै

दोहरी मानसिकता को जीना
भी एक कला है यारो 
सुंदर आवरण से ढका हुआ मै
कितना वीभत्स हूँ ---तुमको क्या पता 
दम्भी सोंच के बीच
लटकता मेरा अस्तित्व 
नकारता है ---पूरे
व्यक्तित्व को ---
फिर भी तुम सराहते हो 
सम्मानते हो ---सत्कारते  हो 
क्यों ----?
अज्ञात से ज्ञात का 
रहस्य ही 
तुम्हारी खोज  होगा ---
फिर नग्न मै  
आरंभिक  अवस्था का 
आभास दूंगा -------
तब शायद तुम तुम ना होगे ---
हम तुम में 
पिघल रहे होंगे -----

बेदर्द -ऐ- जिन्दगी

एक छोटी सी चिंगारी
देखी है ---तुम्हारी
आँखों में ---
तुम अश्क की बात
करते हो ------
हम जिन्दगी को
ढूंढते है ------------
मोन हो चुकी
सब वेदनाये ------
ता उम्र पीछा किया
तेरे साया का ----
हर कदम ----
निशानों को ढूंढते रहे
इस बियावान में ----
ये एक नशा था
मेरे हमदम मेरे दोस्त
चिरागों तले---
धुएं को पीते रहे
अँधेरे में ----------
तेरे निशानों की चाहत में
बेदर्द -ऐ- जिन्दगी
हर गम को ----
तुझको समझ
पीते चले गये--------....

Saturday, June 18, 2011

भीरु आवरण


 
शांत जल में 
फेंका  गया कंकड़ 
तरंगित लहरे 
उलासित मन--
तीव्र वेग 
चंचल चिन्तन 
सब कुछ है आज 
पर प्रिये ----
वन्दे मातरम 
की वो गूंज 
आंदोलित करती 
कविता ---
ख्यालो की कब्र गाह 
और मेरा समर्पण 
दिवा स्वप्न की भाँती 
मुझमे 
दफ़न हो गया है --
भीरु आवरण में 
आज ---अपना अक्स 
चटकता हुआ देखा है मेने ---