Saturday, July 30, 2011

दुश्मनी


दुश्मनी 
**********
दुश्मनी शब्द से मुझे परेशानी है कही 
उदार शब्दों की विपरीत बानगी है कही  
उदार शब्दों की कब्र गाह में जब कभी 
आधुनिक जम्हूरियत  की बात सुनता हूँ 
दोनों विपरीत ध्रुव  को एक  करता हूँ तभी 
गौरतलब है कि हत्याओं और आतंक का यह दौर 
ऎसे वक्त भाव हिन् हो जाती  है मेरी अभिव्यक्ति 
स्वभाव से मूलत: कोई भी  यथास्थितिवादी होता है नहीं 
पुनर्जागरण, ज्ञानोदय, फ्रांसीसी क्रांति, औद्योगिक क्रांति 
जैसी घटनाएं  अब घटती ही नहीं -------
चिंतन की सतह पर विरक्त हो जाता हूँ 
क्या करू -------संवेदन शील ---आभिजात्य जो कहता हूँ अभी ----?

अंगूठी


अंगूठी --
सम्मोहन की सतह पर आज प्रासंगिक है अंगूठी 
प्रेम की निशानी और सोंदर्य की अनुभूति है अंगूठी 
तन का गहना और मन की चाहत है ये अंगूठी 
मन का अर्पण और तन का अंग है ये अंगूठी 
अंगूठी --प्रेम सोंदर्य और समर्पण की विरासत है 
मेरी और तुम्हारी  गंभीर चाहत है ये बावली अंगूठी 
वेदना  जब चरम पर हो जाती है भीरु होती है ये अंगूठी 
सांस बंद जब हो जाती है ---लालच होती है ये अंगूठी 
मेरा दंभ है---- खुबसूरत आवरण है ये अंगूठी -------
मित्रो ये प्रेम की निशानी नहीं ---कलाह की जड़ है ये अंगूठी ---

आत्म विवेचना


आत्म विवेचना ---
***************************
जर्जर मका की तरह  आज फिर 
मुझे बदलना ही होगा अपना स्वरूप 
टूटे दरवाजो की जगह आज मेहराब 
सीढिया मजबूत इस्पात की और 
उंचाई आसमान की देखो तो ज़रा 
मुझे पता है की खंडहर बताएंगे की 
इमारत बुलंद होगी ---------?

Friday, July 29, 2011

अस्मिता


मेने पूछा तू कौन  है ----
वो बोली  अजनबी 
मेने  कहा जानता हूँ 
वो बोली  जहे नसीब 
मै हेरान -परेशान 
वो थी  गंभीर ------
सम्प्रेषण की जिज्ञासा 
फिर कुरेदा ----अनजान है तो फिर 
अजनबी के बीच  ----?
वो बोली  फितरत सही --- 
मुझे पता था वो अनजान नहीं 
पर स्वांग है --- कही ------
जान कर अजनबी बन गयी 
जब वो तो फिर 
मेरी नजरो में इंसान बन  गयी वही----
दोस्तों वो और कोई नहीं मेरी -तुम्हारी 
अस्मिता थी -------? 

Wednesday, July 27, 2011

बुलबुला


पानी का बुलबुला हूँ 
छूना मत ----
तरंगित होता हूँ 
वेग  से -----
कंकड़ का एक टुकडा 
मुझे विस्तार देता है 
और तब मुझे 
अपना लचीला पन
आंदोलित करता है 
बहता  हुआ कतरा 
जब समाहित होता है 
मुझमे -----
विराट से लघुता 
का एहसास दे जाता है -------
ऐसे में लीनता की 
परिभाषा बदल जाती है -------?

दिहाड़ी


एक आईने के तीन रूप 
*************************
फुटपाथ पर सोता भविष्य 
मुझे खींचता है अपनी तरफ 
बेबस लाचारी झलकती है 
उनकी आँखों में तब ----- 
माँ का आँचल भी कम हो चला है 
 - ऐ- हमदम 
दफ़न हो चले हैं  हर एक स्वप्न 
अब यहाँ --- रोटी की मार -ओ- मज़बूरी 
इन्कलाब के नारे और बहकते परिद्रश्य  
छोटे कदम और भारी बोझ 
सर पर गारा मट्टी का ढेर 
सुखी  रोटी और खडा  नमक 
तानो की मार और भीगा मन 
बुझती लपते धुंध ही धुंध 
ये व्यथा नहीं सत्य है दोस्त 
रात की कफ़न में लिपटी उम्मीद और 
टकराते विचार आज हम 
बेबस बचपन को दिहाड़ी के किये 
रिरियाते हुए देखते है ---------
***************************************
मध्यम सामान्य वर्ग 
आक्रोशित विवेचना 
आगे बढने की  चाह 
पुलकित तन मन 
संस्कार गत बात और 
पेरो में पड़ी बिवाई -----
आगे का रास्ता -ओ -
पीछे खायी ---------
मात्र दिहाड़ी के लिए आज भी 
हम रुके है --------
कही  भोजन की पीड़ा 
संवेदनाओं पर भारी 
लटकती मानसिकता और 
बेगारी ---
एक दिवा स्वप्न का भ्रम उकेरते है 
हम फिर खड़े --खड़े 
अपना अक्स उकेरते है -----
**************************************
शब्दों  की व्यंजना 
और मेरा व्यक्तित्व 
वो रोशन सितारे वो 
मायावी दुनिया 
मात्र दिहाड़ी के लिए 
समझोता और मेरा 
नग्न प्रदर्शन ---
आज प्रासंगिक सा हो गया है 
ख़ूबसूरत आवरण की खाल 
जब केचुल उतारती है कभी 
स्पंदित दिल की पुकार 
 धिकारती है तभी ---- 
उस वक्त की सतह पर 
सहम -सहम  जाता हूँ -----
नकारता हूँ अपनी सोंच को 
दिहाड़ी के लिए फिर 
रुक -रुक कर 
बढ़ जाता हूँ ------------------?

विचार

आज जब हम अति आधुनिक होने का दावा करते है तब कही मुझे लगता है हम अपने जमीर को भ्रम में रखते है ----आज हम संस्कारों की बात तो करते है पर क्या वास्तव में उसका अनुसरण करते है ---मुझे नहीं लगता की आज हम संस्कार गत प्रासंगिक है ---बढ़ते मीडिया का प्रसार हमें संस्कार विहीन कर रहा है ----आज कई बानगी देखने में आती है ---पुरुष अन्तह वस्त का विज्ञापन और महिला द्वारा देह प्रदर्शन --पुरुष बाड़ी डियो---महिला का आलिंगन ---ये सब क्या है ---क्या हम अति आधुनिक होने का आधार देकर नग्न मानसिकता को पोषित नहीं कर रहे है ---क्या आज पुरुषो को उपभोगता वादी नहीं घोषित किया जा रहा है ---क्या महिलाओं को सामान बेचने का माध्यम नहीं समझा जा रहा है ---हम किधर जा रहे है ---क्या ये सामाजिक संरचना के विरुद्ध उद्घोष नहीं है ---हम क्यों नहीं महिलाओं को मर्यादाओं में रहने का सन्देश नहीं देते ---एक सवाल महिलाओं से क्या वो मात्र उपभोग की वस्तु तक अपने को सीमित करना चाहती है वो ---क्यों भोतिक वादी संस्क्रती का हिस्सा बन रही है ---विवेक में वो बहुत आगे है --पर क्या नग्नता ही आधुनिकता है ---विचार करे ---मुझे आप सब के विचार चाहिए ---की हम किधर गलत है ----आभार सब का ---- ...

Tuesday, July 26, 2011

कतरा


अब तुम क्या 
कीमत लगाओगे मेरी ----
सच तो ये भी है मेरे
 हमदम -दोस्त- ऐ -मेरे 
बहुत समझा पर फिर
 भी कम है देखो दुरिया 
अब मेरी------
आरजू ना बाकी इस जहां में 
कोई अब तो मुझमे है  ----
ख्वाबो में दफ़न  हो चली हैं  
हर ख्वाहिशे  मेरी  ---
रोशन करने की बात जब की 
तुमने मुझसे फिर  कभी ------
अचानक अंगुलियाँ जला दी 
खुद ही अपनों की ----
तुम मेरे ख़्वाब में 
अब आती भी तो क्यों ---?__
सच है आज खुद से कहता हूँ 
सपना उम्र भर भ्रम का 
देखा वो अब मै सहता हूँ -----
मै पानी का था-----  कतरा ही सही 
समुंदर ने फिर भी ढूंढ़ है
 मुझे-----------------------
 तुममे आज फिर  कही -----?

Saturday, July 23, 2011

रुसवाई


मेरी गूंगी चाहत  आज फिर 
रुसवाई की चादर पहन कर जब
खुली छत पर टहलती है कही 
चाँद चांदनी की आगोश में छुप जाता है 
सावन मोसम को भिगोता है और तब 
तुममे माशुका मुझे नजर नहीं आती  है 
हुजुमे -अपाहिज (अपाहिजों का समूह )
सितारों में हम कही खोजते है तुम्हे --
सूरज की रुपहली किरणों को खोलते है कही --
सच है मै अचानक --सहम सा फिर जाता हूँ --
इन्तजारे मुजस्सम (साकार प्रतीक्षा )
के ख्याल में हम फिर दोजख से तब गुजर -गुजर 
जाता हूँ---------गुजर गुजर जाता हूँ -----!!!!!!!!!

Friday, July 22, 2011


मेरी तरसती निगाहें खोजती है अब तुम्हे 
लम्हों को  जिया था जो  कभी आँगन  में 
अचानक तारा जो आसमा में था कही वो 
दफअतन हो चला है मेरी निगाहों में वही--
प्यार की बयार ही कुछ ऐसी चली  हमदम 
सर्द एहसास की गर्मी में दहकती है जबान अब मेरी  ------!!!!

Thursday, July 21, 2011

रुदाली


आज मन व्यथित है फिर क्यों 
एक रुदाली को देखा जब  मेने  ---
आधुनिक हो चले जब से तुम -हम 
सदिया बीती ---वंश बदले 
बदले हर मोसम के रंग ----
प्रान्तं हर
 दिशा वही बस एक राह 
पर -----
भिन्न परिवेश --------------
रीति रिवाजो की देहरी पर 
मूक हो चले अब तुम- हम 
पाषाणों की दुनिया में 
एक अलबेली रुदाली की धड़कन 
आज व्यथित मन अचानक मिलता है 
जा कर जब उसके द्वार -------
-एक रिदम है 
एक ही जीवन -
-एक सा सपनो का संसार 
पेट की पीड़ा मन का कंम्पन 
और निरीह है परिवार ---
पता नहीं ऐसे में क्यों मै
कंम्पन को पढता हूँ ---
कंम्पन  में  भी फिर कुछ 
थिरकन  सी हो जाती है 
बिम्बित होते इन कंम्पन  में 
आज मुझे रुदाली फिर 
क्यों याद आती है ---
प्रासंगिक  नहीं फिर भी 
मुझ में  वो तार्किक सी  हो जाती है 
और मै मूक  हो करके 
स्वीकृति सी दे जाता हूँ ---
आज मुझे फिर रुदाली फिर बहुत 
प्रासंगिक सी लग जाती है -----
आज मुझे फिर क्यों -----
रुदाली प्रासंगिक सी लग जाती है ------...

Wednesday, July 20, 2011

इकरार


बात इकरार की हो तो 
बताता हूँ आज  ---
राज सीने में दफ़न है 
उसे खोलता   हूँ आज 
हकीकत  मै  प्यार हमने भी 
किया था  कभी ---
जब भी चाहा 
इनकार किया था तभी  
कम तुम भी  ना थे ज़रा 
उस वक्त ---
दर्द भर कर सीने में 
इकरार किया हमने जब कभी 
लफ्जो की रवानगी मोजूद 
दस्तूर की दुहाई ------
इनकार----
तुमने भी किया था तभी 
ये सच है कबूल करता हूँ आज 
मेरे हमदम -मेरे हम राज --
एक अनोखा 
रिश्ता हमने 
 निभाया था कभी ------!!!!!!!

Monday, July 18, 2011

तीव्रता


मुझे पता है
 की मेरी सांस भी
 बंद जब होने  लगी
तुम  मेरी  सोंच में
 बहती चली गयी 
एक  शिद्दत(तीव्रता ) से कभी 
आँखों से गर्म लहू टपकने लगा 
जखम का ------दफअतन(सहसा )
मेरी कराह का रिश्ता ---
जो तेरी आहो से था कभी 
मेरी कांच की दुनिया आज 
अपनी ही वीरानियो में बेवा  जमी में 
जमीदोज  हो चली  है कही -----?
मेरी आँखों से गर्म  लहू फिर बहने लगा  है वहीँ --------------!!!!!!!!!

Saturday, July 16, 2011

रंग और महक


रंग और महक से उभरे जादू 
बिखरती फिजा ,
भूला हुआ अफ़साना 
आज ---
 फिर बुनता है मुझे ---?
याद में है वो दिन भी 
जब    जिंदगी   एक   एहसान   में 
केद  थी  ----!!!!

दामने दिल


दामने दिल में (दिल रूपी दामन )
तलखिये -एहसास (अनुभूतियो की कटुता )
लिए फिरता हूँ -----
मै एक ख़्वाब हूँ 
जो उभर -उभर 
आता हूँ -----------

Friday, July 15, 2011

दहशत


ये संयोग नहीं कि--
लम्हों को पलों में जीना 
और ----
पलों को सदियों में गिनना ---?
जब कभी 
आंदोलित होता हूँ 
दहशत से ----
कही चिटकन का 
एहसास होता है 
तब ---
नाकाबिले गिरफ्त (जो पकडे ना जा सके  )
स्म्रतियां ----
मंथन कि सतह पर 
बोझ बन जाती  है 
उनको अनुभूति में 
ढालना फिर -----
बहक -बहक जाना 
सच में मेरा मर्म 
उनको पकड़ने ही 
कोशिश में ------
फिसल कर 
टूट -टूट जाता है ------!!!!!!!

Tuesday, July 12, 2011

शून्य में चित्कार है


बहकती जिन्दगी

बात चली तो कहता हूँ
आज फिर
बहकती हंसी रुक गयी है
कही ------
जमे आंसुओ की तरह ----
आज फिर ----
हमने तो अंधेरो के साए में
बहकती जिन्दगी
देखी है कही --------------!!!!!!

Monday, July 11, 2011

उड़ना

उड़ना जरुरी हो तो 
पंख फेलाओ ज़रा 
सच तो ये है की 
व्योम की कोई 
पेमाइश नहीं है -----?

धूम केतु

अक्सर तुम धूम केतु कि
बात करते हो -----?
शहर  में घुघुओ 
का सफ़र जारी है -----?

चीख


चीख-----
**********************
खामोश  होती चीख का शून्य
बहुत कुछ कह रहा है 
अपनी व्यथाओ को सह रहा है 
जी हाँ 
उचित है 
खामोश  होना 
चीखना --चिल्लाना फिर रोना 
सच मानिए जब आप रोयेंगे 
बहुत कुछ खोएंगे 
सिसकती कृतिमता पास पायेंगे 
बहुत कुछ 
सह  जायेंगे 
पी जायेंगे 
व्यथाओ का वो हाला भी 
पर अपनी व्यथाओ को 
ना भूल पायेंगे 
स्वयं उसे सहलायेंगे 
अच्छा लगता है 
स्वयं द्वारा सहलाना 
अपनी व्यथाओ को 
दुलराना ---
कोई कृतिमता तो ना होगी 
सिसकती मानसिकता 
तो ना होगी ---
सिर्फ 
एक क्रुन्दन  भरी 
चीख सम्पूर्ण 
अंतस में समा जायेगी 
अपनी व्यथाओ को गढ़ जायेगी 
इंतज़ार करेंगे फिर 
उस उठती हुई 
चीख का 
जो अंत में 
खामोश होती चीख का 
शून्य बन जायेगी -----
शून्य बन जायेगी -----!!!!!!!!!!

Saturday, July 9, 2011

vartika: एक हकीकत

vartika: एक हकीकत: "एक हकीकत -- ***************************************** मेरे महबूब याद है मुझे मुझ को बुला कर कहा था तुमने चाँद को दाग से भरा देखती हूँ ..."

एक हकीकत

एक हकीकत --
*****************************************
मेरे महबूब 
याद है मुझे 
मुझ को बुला कर 
कहा था तुमने 
चाँद को दाग से 
भरा  देखती हूँ 
कभी --
दाग में मै दिखता हूँ  तभी -----!!!!

हकीकत

मुझे रहने दो यार 
आज फिर नशे में ----
बहुत सर फिरा हूँ दोस्त 
जिंदगी में ------
भ्रम का पर्दा गिरा रखा है 
कही ---
ये हकीकत है यार --
हकीकत ही अब रहने दे ----------!!!!!

Friday, July 8, 2011

तितली

गिर गये आज 
मजबूत दरख्तों
यार तुम भी देखो 
आंधियो की सोगात में अब 
फूल से लिपटी
पड़ी है यार तितली
दम हो तो आज उसको भी
हिला कर देखो ----
सरकती जाती है जिंदगी
कुछ इस अंदाज से
इस जमीं का
दरकना तो आज देखो ------
काव्य का
आकर आज ये है
रंग बिरंगी
तितली के पंख देखो -----
मत छुओ
बेचारगी की ----
मोहताज थी जिन्दगी कीतब वो
आब तो यारो
प्यार से बस
उसका उड़ना ही देखो -------
...

प्रासंगिक नहीं ------?

प्रासंगिक नहीं ------?
*************************
वो नया परिवेश था
तुम घबराई कुछ
सकुचाई हुई  थी
मुझे याद है
आज भी
तलवारों के साए में
हाथो की लकीर  से
खीचा था तुम्हे ---
युग बीता
सदिया बीती
हिम भी पिघल गये
हम आज भी
वही है --पर
तुम ---?
सिलवटो की
परिध में
अभी भी
उलझी हो
क्या मेरा
अस्तित्व नकारता है तुम्हे
या आज हम
प्रासंगिक नहीं ------?

Wednesday, July 6, 2011

चुभते कांटे

आज ------
चुभते कांटे
यादों के दामन
से चुनता हूँ...
फिर भी
तुम कहते हो ---
दामन अभी साफ़ नहीं ----?.

एक मज़बूरी है --------?

अजब विडम्बना
विकास वादी कर्ण धारो ने
आज ---
ये भी नहीं सोंचा
झुग्गियों-झोपड़पट्टियों
की संख्या नहीं
समस्या
कम करनी है ----
मशीनों व हाईटेक पर
आधारित आधुनिक विकास तो
बस अब
एक मज़बूरी है --------?

कुछ दरकता है -------------!!!!

मेरे अंदर कुछ दरकता है अब 
जब  मजलूम मजदूर गारा ढोता है 
किसान कर्ज  के बोझ से रोता है 
बेटी के दहेज़ को विधवा माँ सोंचती है 
शिक्षा संस्कारों को खोती है ---------
कवि कविता में विचार खोजता  है 
चिन्तक असंयमित होता है -----
बच्चा रोटी को रोता है -----------
सच   है ---
मुझ  में  फिर  कुछ दरकता है -------------!!!!!

Tuesday, July 5, 2011



हाँ 
हमने भी 
पत्र लिखा था कभी 
जब एहसास 
जगाने लगे 
भरी आँख 
स्वपन दिखाने लगे 
मर्म जब 
अजनबी होने लगा 
स्पंदन भी 
बोझिल होने लगा 
तब हमने  भी पत्र 
लिखा था कभी--
ना तेरा जवाब 
 आया अभी 
झुल्झुलाहत में 
मुझको 
ना बुलाया कभी 
और हम आज भी 
सहमे से 
इन्तजार  में जवाब के 
दुवा ही किया करे ---?


जख्म


तुम्हारे दिए जख्म 
अब 
भरते नहीं --
ये वो गम है जो 
कभी 
मरते नहीं 
चाहत थी उम्र 
निकल  जायेगी 
खूबसूरती  में 
अब  तो रास्ते है 
मंजिल भी है 
वक्त भी और 
दस्तूर भी --
लेकिन 
रास्ते देख कर 
मंजिल नहीं 
मिलती 
मुझे ----!!!!!!

रेतीले पहाड़


रेतीले पहाड़ और 
पानी की चाहत 
दरकते हिम खंड और 
पिघलते  हम - तुम 
बंजर जमीं और 
लहलहाते खेत 
मुझे आज भी 
आंदोलित करते है ---
हर फिजा में अब 
मेरी साँसे भी रूकती नहीं 
पाँव भी थकते  नहीं 
आह भी थमती नहीं 
हाथ भी उठते नहीं --
सुर्ख  आँखों में 
सुरमई ख़्वाब 
मुझसे मेरी 
जमी की पहचान 
पूछते  है ---------?

Saturday, July 2, 2011


काली होती शाम  और 
पानी का वो बरसना 
बिजली का चमकना और 
तुम्हारा लिपटना 
याद है मुझको 
तुम्हारे 
हर एहसास को 
जीता हूँ
आज भी 
महसूस करता हूँ 
सब कितना 
अपना 
और 
अपना था वो 
अचानक सफ़र कब ख़त्म हुआ 
पता ही नहीं चला 
आज हम 
अपना-अपना कोर्स 

अपना-अपना दायरा

अपना-अपना भविष्य

फिर
वो यादे -----
बारिश में आज भी वही खडा हूँ 
सब कुछ है 
पर वो एहसास नहीं 
ऐ बरखा अब ना आया करो ------
मुझे अब स्मृति 
पसंद है -----!!!!!

Friday, July 1, 2011

छला


आकाश फिर दहक उठा 
क्यों की -----
बेटी का सुहाग 
फिर 
छला गया ---------?

नाता


पीड़ा का आंसू से 
वही नाता है 
जेसा जीवन  का 
साँसों से ---
घने केशो का 
श्याम रंग से 
बादल का 
वर्षा से ----
अज्ञात का ज्ञात 
से -------------------------------

सर्प


अब मुझे 
मनुष्य और 
सर्प ----
एक से 
लगते है ------
एक पालता है 
दुसरा 
डसता है ---------? 

संतुलन


उनकी सादगी
उनका पैना पन
उनकी झुरिया
उनका अकेला पन
उनका परामर्श
उनका आक्रोश-------
वो चुलेह की रोटी
वो बटुवे की दाल -----
वो चोके का सूना कोना
वो उकेरी रेखा ----
वो कंकर से थाली का .
संतुलन ----
वो प्यार का आग्रह
अब -------------------------
कोने में लगी दीवार पर
तस्वीर के दो कोनो को
दर्शाती है !!!!!!!!!!!!!

सार्थक युद्ध


ढलती हुई साँसों में .
बंद होती आँखों में
एक अक्स उभरता है ----
सच में वो कहता है ----
जीवन संग्राम में तुम
फिर असफल हुए -----
क्या पुनर जनम में
सार्थक युद्ध कर पाओगे ----
इतिहास रच पाओगे
यदि नहीं तो -----
दर्पण के इतने करीब आ जाओ
की अपने साया भी ना देख पाओ
ये जनम तो मै में गया अब
तब क्यों पस्ताया -----
परम आनन्द की प्राप्ति में
फिर क्यों नहीं समझ पाया
तुम मानव ही भले थे -----
अपने संस्कारों में तो पाले थे
संसार तो भंगुर निसार है -----
फिर तुम क्यों लड़े थे ----
युद्ध कभी शान्ति दूत नहीं हो सकता
मूल सत्ता पर अधिकार कभी भी नहीं हो सकता ---
समस्त चिंतन की गहराई में
फिर----
गीता का सार ही
सबसे अच्छा लगता
हे दिव्य ज्योति तम्हे
प्रणाम !!!!!!!!!!!!!