Monday, November 14, 2011

जिन्दगी कम है


मै कभी 
आधा -अधूरा न था ---
जब तक ----?
तुमको न देखा ----
पता नहीं वो कोन है 
जो कहता है की 
उसे फुर्सत मिल गयी 
जमाने से ----
हमें तो गुनाह 
करने को भी 
जिन्दगी कम है -----

Thursday, October 20, 2011

तुम्हारी आँखों में


तुम्हारी आँखों में
 जब भी देखा 
अजब सा संसार देखा -------
कभी इकरार तो कभी -----
इनकार देखा ------
हम तो खड़े थे राहो पर 
मंजर वो अनोखा 
 तकरार का देखा ---------

Wednesday, October 19, 2011

कतरा -ए- शबनम


क्या कहूँ दीवानगी की दास्ताँ 
वो वक्त का दरिया भी खूब था 
कतरा -ए- शबनम  गिरा कही 
 किसी की  आँखों से -----
अपना ही अक्स देख कर 
शर्मा  गया हूँ आज फिर मै--

खुद ही


सरहदों की सीमाओं से गुजर जाता हूँ -
डूबता हूँ तो कभी  सिहर सा जाता हूँ ---
जीता हूँ जब कभी उस पल को देख कर 
मै खुद ही अपनी  खोज में खो जाता हूँ ----

Saturday, October 15, 2011

नारी की पीड़ा


नारी की पीड़ा 
********************
मेरे शहर में नारी 
आज भी सुरक्षित नहीं है ---
जर्जर हो चुके पल्लू  के बीच
दुर्भाग्य नापती हुई 
वो ------
निर्विकार द्वंद को 
जीते  हुए ---
वजूद को परे धकेलते हुए 
निर्माण की इकाई 
बनते हुए --
अपने धर्म  को 
उन्माद के चरम पर 
मंथन की सतह पर ---
सच है ----
मेरे शहर में नारी 
आज भी सुरक्षित नहीं है --
????????

Friday, October 14, 2011

द्वंद


द्वंद 
*******
मेरे अंदर होने वाला द्वंद 
तुम्हारे और मेरे 
अनुपूरक संबंधो को 
गढ़ते है ------
जब अभिव्यक्ति खामोश होने 
लगती है ----
अँधेरे छटपटाते  है ----रौशनी 
की दरकार में ------
ऐसे में मेरा फिर 
अक्स वजूद खो देता  है -------????

Saturday, October 8, 2011

गुमशुदा ख्याल


अनजान पथ पर
भटकते हुए  फिर
 गुमशुदा ख्याल आया
मखमली जिस्म और गेसुओ
की सौगात आज
फिर याद आया
हम तो भटके थे उस राह में
फिर दुबारा   हमें आज फिर वो
ख्याल आया -------
 करवटे बदल रही है
रूहे शबनम  कोई ----
जमी से भटक कर
अब --आसमान  से हो आया  ---
अनजान पथ पर
भटकते हुए  फिर
 गुमशुदा ख्याल आया
 

Friday, October 7, 2011

क़त्ल

सूरज  जब चरम पर होता है
दिशाए भ्रमित करती है मुझे
सोंचता हूँ --तपन की आंच
और
स्नेहिल स्पर्श क्या होता है ---?
वक्त गुजरता है -----
अति आधुनिक हो चले हम और तुम
सूरज के अंतिम लम्हों तक
साथ चलने की कोशिश करते है
गंभीर होते समय के बीच
मुझे बहती दोपहर में
पलो को अपनों से ही
क़त्ल होते देखता हूँ ----?

Tuesday, October 4, 2011

वीरान समय

वीरान समय का जिक्र
जब कभी आया -----
सच तुम्हारा साया
तभी नजर आया ------
लोग कहते है की
साया अस्तित्व से
अलग नहीं होता
मुझे पता है ----
सूरज जब चरम पर होता है
साया भी बढ़ा होता है ---
कम रोशनी
कद को घटा देती है
फिर वीरान समय
की बात -----?
दरकता है समय का
वो चक्र भी ---
जब सुरमई शाम
योवन पर होती है -----
आयता कार आकार में
साए का कद नहीं देख पाता हूं ---
सच है ----
वीरान समय का जिक्र
जब कभी आया -----
सच तुम्हारा साया
तभी नजर आया ------?????????????

Monday, October 3, 2011

विचार

मै एक विचार हूँ ---
जो बदल - बदल जाता हूँ --
रात जब गहराने लगे ---
बंद चाहत के आकाश में
परिंदे पंख फेलाने लगे
एक चाहत का दामन पकड़ कर
तुम  फिर आंदोलित करती हो
हम निर्विकार
वही---उस पथ पर
खडा
प्रतीक्षा में
बंद मुट्ठी को और कस कर
बंद करता हूँ
मुझे पता है
मै एक विचार हूँ ---
जो बदल - बदल जाता हूँ ------

Tuesday, September 20, 2011

कम्पित तन

कम्पित तन  और
शंकित  मन के मध्य
लोग कहते है अपने
वजूद को ख़त्म कर के
जीवन को देखो ---?
नई परिभाषा बनेगी
मै अचंभित ---
उस पल को निहारता हूँ
जब अमलतास पर
कोई बेल चढ़ेगी -----?????????

Friday, September 16, 2011

गद्दार


गद्दार
***************
आधुनिक होते वक्त में 
अजब दास्ता है -----
आदमी -आदमी नहीं 
अब तो गद्दार है ----
व्यंजनाओ के स्तर पर 
गद्दार वो अभिव्यक्ति है 
जो खुद को ज़िंदा रखने के लिए 
जमीर को मार देती है 
कर जाती  है 
विश्वासों का दमन 
और लिख जाती है 
गद्दारी की क्रान्ति 
मित्रो ---
गद्दारी वो निर्वस्त 
भावना है जो 
खुद को उचित बताती है 
पर उसे नहीं मालुम 
ये वो सिद्धांत है 
जो गिरते हुए नित्य 
आयाम है ---
अभिव्यक्ति के सोपान पर 
बिखरा हुआ वो लम्हा 
जो तिरस्कार के योग्य है 
इस लिए मेरा  ये कहना है 
गद्दारी वो 
शब्द है 
जिसे स्वीकारना 
असत्य है ------- ?????

Thursday, September 15, 2011

लफ्ज


लफ्ज 
******************
जब लफ्ज खो जाते है 
हम समझ जाते है ---
हवा का वेग बन कर तुम 
गुजरते हुए सिहरन सी 
दे जाते हो ----
और मै निर्विकार ---निरुत्तर 
सहम सा जाता हूँ -------
मुझे पता है ----हवाओं का 
कोई रुख नहीं होता 
वो दिशाओं में व्याप्त है 
मेरे संस्कारों में कही 
आगाज है -----
निरंतर --फिर निरंतर 
वास्तविकता के धरातल पर 
वही- कही ---
हम अभिव्यक्ति के लिए 
लफ्ज खो जाते है --------?

Wednesday, September 14, 2011

शब्द


शब्द
************************
और मेरे शब्द टूट जाते है 
जब भी सच बोलता हूँ ---
तुम गर्म मर्म की बात करते हो 
संवेदनाओं को उड़ाते हो 
नये आयामों की बात करते हो 
ये सच है वही मेरे शब्द फिर 
टूट कर बिखर जाते है ----
टूट -टूट जाते है ----?

Tuesday, September 13, 2011

चाहत


चाहत 
*********************
चाहत की जमी में 
आरजू थी जिये---
क्या करूं---बेबस 
लाचारी की दास्ता
फिर वही --
इतने --------
करीब से गुजर 
गया कोई -----?

Monday, September 12, 2011

भीगे मर्म


भीगे मर्म 
*********************
मार्म जब भीग जाते है 
तुम बहुत याद आते हो 
खो जाते हो मेरे विचारों में 
फिर बहेक - बहेक से जाते हो 
मै मर्म को भीगने से बचाता हूँ 
तुम बरस से जाते हो --
मुझे अच्छा लगता है
तुम्हारा बरसना 
मेरा भीगना ---
अंत में प्रत्यंचा 
पर गुनगुनाता हूँ---तुमको 
खुद को ----? कल्पनाओं के 
उस शिखर पर जहां 
बादल आरम्भ होते है 
तुम आकार बदलने लगते हो 
मुझे भय लगता है की कही 
इंद्र धनुष की खूबसूरती 
तुम्हे मुझे दूर ना कर दे 
दमित भाव लिए मै 
समय को रोकना चाहता हूँ 
मुझे पता है 
काल को वश में नहीं किया जा सकता 
पर मेरा प्रयास जारी है --रहेगा --
क्यों की मेरा मर्म भींग चुका है ---
उसकी सुलगन 
धुवा बन कर मेरे पूरे अस्तित्व को
जला रही है ---
मुझको शीतलता की उम्मीद है --?...

साए


फितरतो के साए में जीते थे हम------

कोई बताये परिंदों के साए भी कही होते है ----

Saturday, September 10, 2011

शांत झील


शांत झील
***************************
शांत झील में फेंका गया पत्थर 
मुझे बैचेन कर जाता है हर वक्त 
तरंगित लहरे बया करती है ---
उसके आंदोलित स्वरुप को ----
एक बोझ बन जाती है वो झील 
फेंके गये पत्थर से ---
और मै घुमाव दार चक्र में 
उलझ जाता हूँ -------
फेंका गया पत्थर --वो तरंग 
वो मेरा आंदोलित होना ---सहमी झील में 
थिरकन पैदा करने को व्याकुल रहता है 
पता नहीं और कोन आये और शांत झील को 
तरंगित कर जाए -----एक और बोझ दे जाए ---

Friday, September 9, 2011

बारूद की भाषा और हम


बारूद की भाषा और हम

*****************************************
मर -मर के जीते है हम आज 
किस- किस की बात करे आज 
जिस राह  पर चलते थे बे- खोफ 
आज बारूद बिछे है मंजिलो में वही
भाषा बारूदी है मजहब नहीं कोई 
अक्स भी नहीं ज़िंदा है देखो तो यार 
कितने हैं ज़ख्मात हरे, आज राहों में 
अस्मिता   बारूद बन कर पीर झरूँ यारा---
सफ़र अभी लम्बा बहुत है यार ---
क्या कहूं बारूद की भाषा और हम और आप ----??????

यौद्धा एक उलझा सवाल ---?


यौद्धा  एक उलझा सवाल ---?
**************************

 यदि हम भी
 तुम्हारी तरह
 दिखावे और अय्यासी की 
जिंदगी जीने का शौक रखते तो  
विजेता बनकर
जीते ---पर 
 तुम पर हमारी जीत का
अहम् कारण
दिखावे से दूरी
 और सच्चे यौद्धा  का जीवन जीना ही है
 विजेता बनने और फिर बने रहने के लिये
 व्यक्ति में संयम, सादगी और 
लगातार कठोर परिश्रम की
 खूबियों का होना बहुत अनिवार्य है।
मंथन की सतह पर 
खो चुका अस्तित्व अब नकारने लगा है 
अपनी अस्मिता को -----
एक अनचाहे चक्र में दफ़न होने को तेयार नहीं 
मेरी अस्मिता ----------
मेरी विवेचना नकारती है ----
क्या -----
पैसा और प्रतिष्ठा पाकर भी जिनके कदम नहीं 
लडख़ड़ाते वही लंबे समय तक कामयाबी के शिखर पर टिक पाते हैं। 
ये प्रशन आप पर छोड़ता हूँ -----
 

Tuesday, September 6, 2011

दफन

दफन
***************
किसान की वेदना
तब समझ में आई
जब दफन हो गयी
उसकी लुगाई =====
और वो जमीन जो
गिरवी हो गयी कर्म में
जमीदार के मर्म में ----...
मै आज भी निर्विकार
सोंचता हूँ हर पल ---
क्यों होता है वो लम्हा
दफ़न ---एक विकार में
आह्लादित होता हूँ जान कर
वर्तमान की कब्र गाह पर
लम्हों -पालो को सिकुड़ना
मेरा अनजान बनना---और
किसान का कर्म करना ----
सच है आज बुनियादी बातो का
रोना --फिर  चीखना और
अंत में खामोश होना -----?
वेदनाओं को खोना ------------????????
कह सकता हूँ किसान की वेदना
अब समझ में आई --!!!!!!!!!!

Friday, September 2, 2011

इन्तजार है


तूफानों में भटकते हुए 
अब ज़माना हो गया --
मगर चन्द ख्वाब अभी भी-------
मेरे जहन में  दफ़न है 
ज़िन्दगी मुझे अपने रास्ते हाँकती रही
और हम ------
पुराने ख्वाबों की चादर ओढ़ कर रात गुजारते  रहे 
जानता हूँ..
सारे सपनों को हकीक़त की धूप नसीब नही होती
फिर भी एक अनजान चाहत मुझे बांधे रखती है 
तुम्हारे समागम में मुझे आज भी 
अपने मर्म की गर्मी के  एहसास का
इन्तजार है --------

Tuesday, August 30, 2011

संतुलन


तुम हवाओं में थिरकन पैदा करते हो 
हम आवाम की आवाज है कही -----
शब्दों के निर्माता  तुम ----------
खामोश होती अभिव्यक्ति हम 
संतुलन की अवस्था में ----------
मुझे मेरी पहचान मेरा अक्स को 
नकारती है ----------?

रक्त बीज


रक्त बीज
***********
रक्त बीज का जन्म 
और मेरी निष्ठा कभी 
एक ना हो सकी -----
आज व्यवस्था  परिवर्तन 
की आवाज --
आवाम ने फिर दोहराई --
मेरे गावों में आज भी 
धुंधली आजादी के बीच--
 मॅंहगाई और गरीबी के छाव तले
महिलाए ---अपने आंसू से 
आटा गूंथती हैं---सच है ---
आज फिर ---
रक्त बीज का जन्म 
और मेरी निष्ठा कभी फिर 
एक ना हो सकी ----

Saturday, August 27, 2011

आवाम की आवाज़


आवाम की आवाज़ 
**********************
लखनऊ ----बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ---बचपन में कभी निबंध लिखा था ----का वर्षा  जब कृषि सुखानी ----आज जब देश के हालत देख रहा हूँ तो अतीत की कुछ यादे ताजा हो रही है ---हम स्वतंत्रता आन्दोलन की बाते बड़े चाव से पढ़ते और सुनते थे ---उस समय अधिक ज्ञान नहीं था --पर लगता था ही हमें आजाद कराने में लोगो ने बहुत प्रयास किये --फिर कही हम आजाद हो पाए ---आज जीवन के इस अवस्था में भी हम प्रश्नों के साए में खड़े खुद को पाते है ---क्या हम सही आजादी पा सके है ---? क्या हम लोकतंत्र में आजाद सांस ले पा रहे है ---? जहां विचारों का सम्प्रेषण करने के लिए एक व्यक्ति १२ दिनों से भूखा बेठा है और हमारे चुने  प्रतिनिध एवं सरकार --लगभग सभी चिन्तन शील पटल अभी तक खामोश ----मूक --ये क्या त्रासदी से कम है ---मुझे आक्रोश है व्यवस्था से अपने उन साथियो से जो लोकतंत्र को भाषित नहीं कर पाए -----क्या हम सांसदों को अपनी आवाज़ के रूप में नहीं भेजते है ---वो संसद के पटल को इतना क्यों उलझा देते है की सकारात्मक बात अपना अस्तित्व खोने लगती है ----अन्ना जी के मुद्दे में मुझे अपने जन प्रतिनिधियों की ये प्रतिक्रिया समझ में नहीं आ रही है ---ये लोकतंत्र के ताबूत में अंतिम कील जड़ने का काम कर रहे है ----आम आदमी जिसे नियमो का ज्ञान नहीं वो क्या करे ---संसद सबसे उपर होती है आम व्यक्ति की अपनी स्वतन्त्रता  अभिव्यक्ति से भी बड़ी  ये बात आवाम क्या जानती है ----? क्या सामान्य व्यक्ति अपनी बात को बताने के लिए पहले नियमा वली पढ़े ---८५% आवाम आज ग्रामीण  है ---जिस देश में शिक्षा  का स्तर काफी गिरा हुआ है वहां नियमा वली की बात बेमानी है ----आप चर्चा करो और खूब करो --पर इतना देर मत करो की देश अपने किसी भी नागरिक को खो दे ---मुझे ये सही नहीं लगता ----? आज तमाम राजनेतिक पार्टी बड़े -नारों और आदर्शो आयामों ---नेतिकता की बात करती है --सरकार प्रशासन नसीहते देता है --वही एक आम व्यक्ति की आवाज़ में हम जानना  चाहते है की आज हम क्या खो रहे है ==और किस कीमत पर ---देश जो कभी सोने की चिड़िया कहा  जाता था आज हर बच्चा जब जन्म लेता है वो भारी कर्ज में डूबा हुआ है --आखिर क्यों ---? क्या हमें अपने संसाधन पर विचार नहीं करना होगा ---मात्र बिल पास  करना हमारा मिशन नहीं मूल स्वरुप को बदलना उद्ददेश होना चाहिए ----गिरता आदर्श वाद --गिरती मानसिकता ये सब क्या है ----हम पर केपिटा इनकम केसे बढाये ये सोंचने की जगह एक नेक विचारों को दबाने का काम नहीं कर रहे है -----? क्या गलत कहा अन्ना जी ने देश को सही मायने में आजादी अभी नहीं मिल पायी है ---हमें आवाज़ उठानी होगी ==पंगु व्यवस्था के प्रति -------आम स्तर पर रोटी -कपड़ा और मकान की चाहत हर नागरिक का अधिकार है और वो मिलना चाहिए ---हमें सरकार और प्रशासन ---सभी सांसदों से ये आशा है की वो देश के प्रति निष्ठा रखते हुए बिना अड़ंगे के अन्ना के विधेयक को अविलम्ब लागू करे --वा सकारात्मक समाज की संरचना में सहयोग दे ---सभी का आभार -----जय हिंद ---जय भारत --- 

Friday, August 26, 2011

दहकते अंगारे


बहते जज्बातों की क्या बात करूं
दहकते अंगारे ,रोशनी बताते है अब ---

अन्ना

लखनऊ ---दिन भर की राजनितिक गति विधि को आकलन करने के बाद जब शाम गाँधी प्रतिमा के पास पार्क में पहुचा तो मन आशंकित था ---एक दिन पहले कुछ लोगो का मनोबल कम महसूस हुआ था आन्दोलन के प्रति ---पर ये क्या ---आज तो जन सेलाब पुरे शबाब पर था ---मेरी सहयोगी बेंगलोर से सुमन का साथ और मेरा सजीव उन्माद ---आज लखनऊ में ख़ास बात जो उभर कर सामने आई वो थी बहुत से सामाजिक संगठन वा समितिया जो आन्दोलन को नया जोश दे रही थी ---समाज के प्रमुख व्यक्ति श्री गणेश चर्तुर्वेदी जी की शिरकत वो भी अपने पूरे समूह के साथ वाह क्या जज्बा था ---सबका एक ही नारा अन्ना तुम  संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है -----सहायता संगठन की बुजुर्ग महिलाओं का उत्साह देखते बनता था ---मेरा नमन उस सभी को -------विकलांग व्यक्ति हो या सामान्य सभी उन्माद में व्यस्त ---और हम एक साथ कई प्रशन  लिए निर्विकार खड़े सोंचते रहे -----एक और गरीबी की बात नेताओं के मुह से दुसरे तरफ गरीब जनता का उद्घोष ---बेचारगी की मार में पिस्ता आम नागरिक और मुखरित होती व्यंजनाये ---कोमल स्पर्श की प्रतीक आम भारती नारी ---वही रानी लक्ष्मी बाई का अवतार ---हम एक साथ तमाम व्यक्तित्व देख रहे थे -----आज हम यक़ीनन कह सकती है हम अपना अधिकार मांगने के लिए मोहताज नहीं -----कही किसी विचार धारा में पढ़ा था की अधिकार मांगे नहीं छीने जाते है उस वक्त हम सहमत नहीं थे पर आज की व्यवस्था में मुझे ये प्रासंगिक लगता है ----हम जागरूक हो रहे है ---ये प्रबल पक्ष है सामाजिक संरचना का ------मुझे ख़ुशी है हम इस काल में जी रहे है जब देश सशक्त निर्माण में जमीनी हकीकत से जुड़ रहा है ----कोन कहता है की क्रान्तिया मर गयी ---हमने जमीदोज  शब्दों को आकार खोते देखा है इस आन्दोलन में ---जय हो ---लिखने को बहुत है पर मेरी सहयोगी सुमन ने पूरी निष्ठा और लगन से जिस प्रकार सजीव समीक्षा की उसका मै कायल हूँ ---और अपना आभार व्यक्त करता हूँ ---आज सुमन पर हमें गर्व है --जिस प्रकार का आलेख निडरता से वो लिखती है ---वो पत्रकारिता के लिए आदर्श दिशा है ---सुमन मेरी बहादुर बेटी आभार ----जय हो जय हिंद  ----

Thursday, August 25, 2011

कफ़न


मेरे कफ़न की चाहत में
गुजर गई सदिया लेकिन --
पलो के जिक्र ने मुझे अचानक
आज आराम से दफना दिया -----

अन्ना जी का जन आन्दोलन

अन्ना जी का जन आन्दोलन और हमारा समर्पण --------मित्रो बड़े शर्म की बात है की हम एक ऐसे लोकतंत्र में रह रहे है जिसमे वंश वाद की परम्परा दिखती है ---जन आक्रोश के लिए आज कोई स्थान नहीं है सरकार के पास -----एक व्यक्ति १० दिन से अनशन पर बेठा है और सरकार के चिंतन पटल पर शिकन भी नहीं ----क्या आज शांत प्रिय आन्दोलन की प्रासंगिकता का कोई अर्थ नहीं है ---किस प्रकार की सामाजिक संरचना ---हम  गुलामो  से बदतर जिन्दगी को ढो रहे है ----आज शान्ति की अपील तो की जा रही है पर --कब तक ---हम सेलाब को रोक सकते है ----हमें संयम से काम लेना होगा -------जन आन्दोलन तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है ---पर हमें अपनी मानसिक मजबूती को दिखाना है ---हम संयमित है ---थे ---और रहेंगे ----दिशा भ्रम उकेरा जा रहा है ---प्रशासन पंगु हो चुका सा लगता है -------महिलाए आक्रोश में डूब गयी है ---मुझे लगता है आन्दोलन और गंभीर होने का संकेत दे रहा है ---लोग पीछे हटने को तेयार नहीं और ये सही भी है ----इतना बड़ा जन आन्दोलन बिना  नतीजे के इतिहास नहीं बना सकता ---हम रोज आन्दोलन को देखते है और महसूस करते है की व्यक्तियों में आक्रोश जबरदस्त चरम पर है --------मुझे कतिपय कुछ चरम पंथी और धार्मिकता कट्टर वादी  लोगो से भी परेशानी है जो इस आन्दिलन को मुख्य mudde से ना  जोड़  कर  उन्माद  (कोमी ) जोड़ रहे है ये उचित नहीं ---आज लोग अन्ना जी को गाँधी  जी के समक्ष  संतुलन  में देख  रहे है ये उचित नहीं ---ये आन्दोलन अलग अस्तित्व के लिए है ----मेरा विनम अनुरोध है की मुद्दों को समझे और अपने विचार दे ---आज साम्प्रदायिक बात नहीं ----भ्रस्था चार को प्राथमिकता देनी है ----सरकार केसी हो इसका भी मंथन करना  है ---बहुत से विषय है --जिन पर स्वस्थ बात की जरुरत है ---आज लोक तंत्र की परिभाषा पर नए  सिरे से विचार की जरुरत है ----जय हो ---जय हिंद ---  

Wednesday, August 24, 2011

लोकतंत्र

लोग कहते है की उड़ने के लिए पंख की नहीं होसले ही काफी होते है ----हम भी काफी प्रभावित हुए इन शब्दों से ----मित्रो के बीच मंथन   के दोरान मुझे आभास हुआ की आज क्या हम लोक तंत्र में जीवित है ----ये अपने में ही एक अहम् प्रशन है ---हम लोकतंत्र की परिभाषा सही अर्थो में जानने का प्रयास कर रहे है ---आज मुझे देश में वंश वाद दिख रहा है ---क्या कारण है हम प्रबल व्यक्तियों को चुन नहीं पा रहे है ---? क्या राज वंशो को समय फिर से प्रमुख हो रहा है ---हम इतने कमजोर तो नहीं थे ---जिनकी हुंकार से विदेशी देश छोड़ कर भाग गए वही चंद जय चन्द्रो के कारण हम फिर गुलामी भोग रहे है ---ये कब तक ---क्या चिंतन पटल पर प्रभुध वर्ग नपुंसक हो गया है ------? हम क्यों सो रहे है -----? मुझको लगता है की लोक तंत्र को नई परिभाषा देने का वक्त आ गया है ---जय हिंद ---

Tuesday, August 23, 2011

अन्ना जी और जन आन्दोलन

इधर काफी दिनों से स्तम्भ में कुछ लिख नहीं पाया ------मन संतुलन में नहीं था ---पर आज लिखने का मन है -----क्या लिखूं ---बात एक आग की ---अन्ना जी और जन आन्दोलन ------अपने पुरे जीवन में हमने जमीनी हकीकत का ये सबसे बड़ा आन्दोलन देखा    ----सुना था जे ० पी०  का आन्दोलन बहुत बड़ा था ---फिर आया चिपको आन्दोलन हम गंभीर नहीं थे तब ---आज अन्ना की आंधी ---जवाब नहीं -----सभी चिंतन पटल पर ये आन्दोलन याद रखा जाए गा ---आजाद भारत में आजादी की सांस के लिए आन्दोलन ---वाह अन्ना जी ---सत्य है व्यक्ति से व्यक्तित्व भारी होता है ---ये साबित हो गया ---ऐसा आन्दोलन को  सब वर्ग का समर्थन है ---सेलाब सडको पर आ गया है ---हमने आजादी का आन्दोलन नहीं देखा पर गर्व है की हम अन्ना जी के आन्दोलन में है ---एक जिमेदार नागरिक के रूप में आज समाज ने दस्तक दी है ---हम कितने त्रस्त है आज व्यवस्था से ----हर जागरूक व्यक्ति अपनी तरह से आन्दोलन को गति दे रहा है ----मूक -बधिर लोगो को जब आंदोलन में शिरकत करते देखा तो मर्म जाग गया ----वो अपने संकेतो की भाषा से अन्ना को समर्थन दे रहे थे ---हम भावुक हो गये ---आज जिस देश में मूक बधिरों को भी आवाज उढानी पड़े ---धिक्कार है ऐसे समाज का ---हमें पूरी संरचना ही पंगु लग रही है ----हम किसी विचार धारा वादी व्यक्ति नहीं है --पर संवेदनाये कही आक्रोश व्यक्त कर रही है ----हम क्या कर रहे है ---क्या निर्माण कर रहे है ---जन सेवक के रूप में सांसद को चुन कर हम संसद में भेजते है पर वो क्या करते है ----केंद्रे द्वारा भेजा गया १ रुपया  आम जनता तक आने में मात्र १५ पैसा हो जाता है ---ये सब क्या है ---अंत में मुझे लगता है की ५०० के उपर सांसद के स्थान पर ५ अन्ना जी जेसे जन समर्थक हो तो देश की प्रगति तेजी से हो सकती है ----आवाम को आवाज करनी ही होगी --तभी हम सार्थक समाज की संरचना कर सकते है -----जय हिंद -----जय भारत -----

Friday, August 12, 2011

खूनो जिगर


मेरी साँसों की डोर तेरे दामन से है 
मुझे अपना वजूद पता ही नहीं ----
आजादी ख्यालो से नहीं मिला करती 
खूनो जिगर जलाए है कही -------

तख्तो - ताज


आजाद तख्तो - ताज पर बेठे थे हम अभी 
आंधियो से कहते हो--नफरत है बड़ी ------     

वक्त


वक्त के साए में  हेवानियत देखी थी कभी 

क्या  कहूं -खंजरो को भी रोना नहीं आया ---

सरजमी


खंजरो के बाजार में रोनक बहुत थी 

मुझको सरजमी की तलाश है वही --

इन्कलाब


बात रोशनी की हुई , मुझे अन्धेरा याद आया 
गुजरे जमाने का वो  इन्कलाब , कब आया ---?

मेरा चिन्तन ---


मेरा चिन्तन ----
**********************
आजादी -----कैसी ----?
शिक्षा का आभाव ---
रोटी की मोहताजी ---
आवास की समस्या ---
नेताओं की भीड़ ----
खोते जमीर -------
भाव हिन् मन ----
सूखे तन --------
चिन्तन वा 
मर्म का घाव --------
मेरा संतुलन -------
मानसिक व्यभिचार ---
नारी दोहन ------
और मेरी खामोश होती 
अभिव्यक्ति --------
क्या हम फिर भी आजाद है ----?

आजादी

आजादी 
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फिर आ गया  आजादी का दिन ---हम मस्त ---बिंदास ---उद्घोष करते हुए चिल्लाते हुए घूम रहे है सड़को पर की हम आजाद है ---हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया है ---अब हम आजाद है -----पर रुको सोंचो ----आज स्वतंत्रता  पर क्या वाकई हम इसका अर्थ समझते हैं या यह छलावा मात्र है. सवाल दृष्टिकोण का है. -----क्या हम अपनी बुनयादी जरूरतों को  पा चुके है ---शिक्षा --स्वास्थ ----रोटी ---रोजगार ---आवास -----सब कुछ जो प्राथमिक जरुरत है --? ये सच है की आज गरीब व भूखे व्यक्ति हेतु आजादी और लोकतंत्र का वजूद रोटी के एक टुकड़े में छुपा हुआ है तो अमीर व्यक्ति हेतु आजादी और लोकतंत्र का वजूद अपनी शानो-शौकत, चुनावों में अपनी सीट सुनिश्चित करने और अंततः मंत्री या किसी अन्य प्रतिष्ठित संस्था की चेयरमैनशिप पाने में है। यह एक सच्चायी है कि दोनों ही अपनी वजूद को पाने हेतु कुछ भी कर सकते हैं। भूखा और बेरोजगार व्यक्ति रोटी न पाने पर चोरी की राह पकड़ सकता है या समाज के दुश्मनों की सोहबत में आकर आतंकवादी भी बन सकता है। इसी प्रकार अमीर व्यक्ति धन-बल और भुजबल का प्रयोग करके चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित कर सकता है। यह दोनों ही लोकतान्त्रिक आजादी के दो विपरीत लेकिन कटु सत्य हैं। फिर भी खुश रहो मित्रो हम आजाद है -----?

Thursday, August 11, 2011

दौर


शतरंज के खेल में अब देखो  मात का दौर है 
गुजर गये जब वो तो कह दिया काफिर था --

मै आजाद हूँ


मै आजाद हूँ 
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आज हम आजाद है 
घर से निकल कर 
रास्तो पर अतिक्रमण 
शिक्षा का आभाव ---
तन पर लंगोटी भी नहीं 
खाने को सुखी रोटी भी नहीं 
खंजरो के बाज़ार में 
आज हम आजाद है ----
दी होगी कुर्बानी किसी ने 
रोया होगा देश तब ----
मै नहीं था --मेरे वालिद होंगे 
रोते थे सभी पर मै --मै हूँ 
इस लिए आज आजाद हूँ ----!!!!!!!

Wednesday, August 10, 2011

कर्ज


कर्ज 
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भूखी अभिव्यक्ति और मेरा 
कर्ज ----
वो सूखे रोटी और मेरा दर्द 
कभी अलग ना हो सके क्यों -?
क्यों की मुझे जमीदोज की 
आदत पड़ गयी है -------?

जलते है आशियाने


जलते है आशियाने 
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जल गये सब आशियाने  जब 
अपने के  चरागों से ------
दो बूंद कतरा भी ना निकल सका 
आँखों के पैमाने से -------
जलता आशियाना नहीं 
अरमान है मेरे -----
तड़पती जिन्दगी में 
धड़कते हम और  तुम है कही 
सुन नहीं रहे है लोग फ़रियाद अब 
क्षत विक्षत सी हालत में--
देख के जलती हुई आशिआने की लाश
मुझे मेरा मुकदर याद आ गया ----!!

Tuesday, August 9, 2011

शहीद


शहीद
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प्रश्नों की वेदी पर 
चल चल  कर रुक जाता हूँ 
डरता जब मौत से फिर 
क्यों ये कह जाता हूं -----
दर्द मर्म का जब उभरा तब 
चिंतन को लिख जाता हूँ ----
है व्याप्त चेतना का संचार 
तब ये कह जाता हूँ ------
उठो प्रेम-विरह से अब 
समय तुम्हे खोजता  है 
रक्त जमे इससे पहले 
क्रान्ति पथ खोलता  है 
उम्मीदों  के दिए बुझ ना पाए 
ऐसा कुछ निर्माण करो ---
देश भक्त थे तुम अब मत अभिमान करो 
नमन सब वीरो को जो 
डर ना सके फिर मौतों से 
हम निर्जन महल के बंद कक्ष  
मौत से क्यों  डरे हुए ---?
इतना डर व्याप्त जब तो 
एक सलाह अब देता हूँ 
 वीरो  की कर्म भूमि 
में आगे आओ और चलो 
डर इतना ही है तो फिर 
आओ और शहीद बनो ----
--------------------------(मेरा सादर नमन उन वीरो को जिन्होंने अपने देश के लिए मौत को गले लगा लिया और शहीद हो गये )

हादसा


दामन बचा कर चलना ऐ  मेरे हमसफ़र ..
देखो मगरप्यार  से , ये हादसों का शहर है--- 

Monday, August 8, 2011

गुनाहगार


तस्वीर  दीवानगी  में  कही  देखी  थी  कही 
 ---मुझे  मेरे  वजूद  ने  गुनाहगार  कह  दिया  --

गुनाह


गुनाह 
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तुमको न्यायसंगत 
ठहराने के लिए 
बाकायदा एक
 राजनैतिक 
तानाबाना बन चुका हूँ ----
यही  मेरा गुनाह है ----?
अपनी सत्ता को
 बचाए रखने की 
छटपटाहट का ही परिणाम है
आज मै गुनाहगार 
होकर भी ---
बेगुनाह    हूँ ---------?  

Saturday, August 6, 2011

अंजुली

अंजुली 
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एक अंजुली भर रेत की 
लिख दिया निर्माण 
कर गये बात दिल की 
बन गये महान ----
नीर की क्या बात करूँ
जब खो गये अरमान 
एक अंजुली रेत की -----
जलन कि वेदना जब 
तपन कि शक्ति बनी 
बन गयी है आग तब 
अंजुली का क्या काम
एक अंजुली रेत की -----------
खो गये सब मर्म जब 
रेत पर साहिल चले  
खो गये हम तब  जब  
अंजुली का क्या काम 
एक अंजुली रेत की -----------

बंधन


बंधन 
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बंध गया हूँ आज
 अपने बुने जाल में 
मोह और अपनत्व ,
 जीवन के जंजाल में 
मेरा फेंका पासा 
आज प्रासंगिक नहीं 
सोंचा भौतिक जीवन ही
 सच है -------?
बुद्ध भी महा भिनिशक्रमण के कारण 
जाने जाते है ------
पर   अब  और नहीं -----
भ्रम अब  और नहीं ----
 कुछ पाने की चाह में , 
न जाने क्या-क्या मैं खोता गया..
बोता गया अपने आकांशाओ का बीज
मै अचंभित हेरान ---दूर कही ----
स्वीकारता  हूँ ---गर्व से आज 
बंधन के बीच , बंधा मै 
अपने बंधन को खोजता हूँ ----? 

गमन


गमन 
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जी हाँ हम गमन करते है ----
घर से ----विचारों से ---संसार  से 
सपनो से ---भूत से वर्तमान या फिर 
भविष्य से भी -----?
पर निर्वाण अंतिम विकल्प है जीवन का 
विचलित मन 
संकुचित विचार मुझे 
रोकते  है ----------आधार खोजते है 
और हम सफल होते है -------
विज्ञान पर बोलते है 
मर्म खोलते है --------
एक फ़ोटॉन को 
आइंस्टीन के प्रकाश के सिद्धांत
से तोलते है ------
अर्थ निकलता है -----
समय में यात्रा करना संभव नहीं---
इस लिए वक्ती तोर पर 
गमन रोकते है --------???????

Friday, August 5, 2011

हाथ की लकीर और मेरा भ्रम


हाथ की लकीर और मेरा भ्रम 
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श्रीकृष्ण ने गीता में
 अर्जुन से कहा  कि 
हमारा भाग्य 
हमारे कर्मों से 
 बनता है और
 कर्म हम हाथों 
से ही करते हैं
लकीरे किस्मत नहीं बनाती 
वक्त लगता है 
हाथ की लकीरों को 
आकार देने में 
मजबूत ताकत और संघर्ष 
आधार है इसका 
तुम व्यंजनाओ को मर्म 
समझते हो ----
हमने श्रम  से बदला है इसे 
मुझे अज्ञात में रहने की आदत है 
तुम ज्ञात की बात करते हो 
लकीरों का क्या --
यही तो कहते हो 
समय का चक्र का 
दर्शन समझाते हो ----दिशा भ्रम 
फेलाते हो ----
हम पूछते  है क्यों --?
तुम बहलाते हो -----
तब तक ---
जब तक हम
 भ्रमित ना हो जाए --?